On World Book Day किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं... महीनों अब मुलाकातें नहीं होती... जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर... बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें, उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं... कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है... कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं... बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़, जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते... जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का, अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है! किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है.. कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे कभी गोदी में लेते थे, कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से... वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के... किताबें मांगने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे, उनका क्या होगा... वो शायद अब नही होंगे! -गुलज़ार

Radio Jockey India | Indian Actor | Event Host | Columnist | Lecturer | Creative Director of Innovative Ideas

On World Book Day

किताबें झाँकती हैं
बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं...
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती...
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है
कम्प्यूटर के पर्दों पर...

बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें,
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
जो रिश्ते वो सुनाती थी
वो सारे उधरे-उधरे हैं...

कोई सफा पलटता हूँ तो
इक सिसकी निकलती है...
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं...
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़,
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते...

जबां पर जो ज़ायका आता था
जो सफ़ा पलटने का,
अब ऊँगली क्लिक करने से
बस झपकी गुजरती है!

किताबों से जो ज़ाती राब्ता था,
वो कट गया है..
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे,
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर नीम सजदे में पढ़ा करते थे,
छूते थे जबीं से...

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रुक्के...
किताबें मांगने, गिरने उठाने के बहाने
रिश्ते बनते थे, उनका क्या होगा...

वो शायद अब नही होंगे!

-गुलज़ार

On World Book Day किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं... महीनों अब मुलाकातें नहीं होती... जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर... बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें, उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं... कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है... कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं... बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़, जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते... जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का, अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है! किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है.. कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे कभी गोदी में लेते थे, कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से... वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के... किताबें मांगने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे, उनका क्या होगा... वो शायद अब नही होंगे! -गुलज़ार

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